उड़ान।
जिगर में हौसला सीने में जान बाकी है
अभी छूने के लिए आसमान बाकी है
हारकर बीच में मंज़िल के बैठने वालों
अभी तो और सख़्त इम्तहान बाकी है
कौन-सी राह जो आसान हो नहीं जाती
यकीन दिल में अगर इत्मीनान बाकी है
रात के बाद ही सूरज दिखाई देता है
मगर रुको तो सुबह की अज़ान बाकी है
मुझे तो इस क़दर अपनों ने ही सताया है
ज़ख़्म का अब तलक दिल पर निशान बाकी है
हो गईं किसलिए खामोश बिजलियाँ गिरकर
शहर में जब अभी मेरा मकान बाकी है
कहर का ख़ौफ़ नहीं है न फ़िक्र तूफाँ की
क्योंकि मुझ पर मेरे मालिक की शान बाकी है
रास्ते बंद हैं गुलशन के, तो गिला कैसा
सबा के वास्ते सारा जहान बाकी है
बंद पिंजरे के परिंदों को पता क्या होगा
आसमाँ के लिए कितनी उड़ान बाकी है!
प्रिंस ठाकुर....
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धन्यवाद....
Fantastic
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